ट्रांसमिशन सिस्टम क्या है | ट्रांसमिशन लाइन टावर | टाइप्स ऑफ़ ट्रांसमिशन लाइन | ट्रांसमिशन लाइन में फेरांती प्रभाव | ट्रांसमिशन लाइन टाइप्स | ट्रांसमिशन सिस्टम किसे कहते है | उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन इंसुलेटर | ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइन | ट्रांसमिशन लाइन में कोरोना का नुकसान
आज हम जानेंगे कि ट्रांसमिशन सिस्टम क्या है और कैसे काम करता है तो कभी आपके विचार किया होगा कि विधुत उत्पादन केंद्र से हमारे घर तक कैसे पहुंचती है तो आइए जानते हैं इसके बारे में स्टेप बाई स्टेप संपूर्ण जानकारी जानेंगे –
फीडर लाइन क्या है ?
वह लाइनजो अल्टरनेटर्स से ट्रांसफार्मर से जुड़ी रहती है वह फीडर लाइन कहलाती है |
ग्रिड स्टेशन क्या है ?
वहीं स्टेशन जहां दो या दो से अधिक उत्पादन के अंदर से विद्युत सप्लाई प्राप्त होती है वह ग्रिड स्टेशन कहलाता है |
सब स्टेशन किसे कहते है ?
वह स्टेशन जहां से विद्युत वितरण की प्रथम कड़ी प्रारंभ होती है वह सब स्टेशन कहलाता है |
सर्विस लाइन क्या है ?
वह लाइन जो उपभोक्ता के घर तक विद्युत सप्लाई उपलब्ध कराती है वह सर्विस लाइन कहलाती है |
ट्रांसमिशन लाइन में उच्च वोल्टेज के क्या लाभ है ?
ट्रांसमिशन लाइन में उच्च वोल्टेज के लाभ निम्न है-
- चालक धातु की बचत होती है क्योंकि वोल्टेज बढ़ने से धारा का मान कम होता है जिससे पावर लॉस भी कम होता है |
- पारेषण लाइन में विद्युत शक्ति अपव्ययो में कमी |
- परेशान लाइन की दक्षता में वृद्धि |
- अच्छा वोल्टेज रेगुलेशन |
- पारेषण लाइन की स्थापना लागत में बचत |
विद्युत वितरण प्रणाली:-
रेडियल प्रणाली –
इसमें सब स्टेशन से अलग-अलग डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर के लिए अलग-अलग लाइन होती है जिसमें आइसोलेटर फ्यूज सर्किट ब्रेकर अलग-अलग ट्रांसफॉर्मर के लिए अलग-अलग स्थापित किए जाते है |
यदि इसमें एक सर्किट ब्रेकर में दोष होता है तो केवल एक ही लाइन में दोष पैदा होता है बाकी सभी लाइने चालू रहती है |
रिंग प्रणाली –
महानगरों में आजकल इसी विधि का प्रयोग सर्वाधिक किया जाता है यदि इसमें किसी एक लाइन का फॉल्ट होता है तो दूसरी लाइन तरफ से सप्लाई जुड़ जाती है तो इसमें कोई बाधा उत्पन नहीं होती है |
अन्त: संयोजी प्रणाली –
इस प्रणाली में सभी सब स्टेशन को ग्रिड स्टेशन के साथ जोड़ दिया जाता है |
विद्युत वितरण लाइन कितने प्रकार की होती है ?
विद्युत वितरण लाइन निम्न दो प्रकार की होती है –
- सिरोंपरी लाइन (ऊर्ध्वाधर, क्षैतिज)
- भूमिगत लाइन
खम्भा (POLE) – जब पोल को स्थापित किया जाता है तो उसका एक बटे 1/6 भाग जमीन में होता है शेष भाग बाहर होता है |
खम्भा | दो खम्भों के बीच की दूरी |
लकड़ी का | 40 से 50 मीटर |
स्टील (पाइप) का | 50 से 80 मीटर |
आर.सी.सी | 60 से 100 मीटर (67 मीटर या 220 फीट) |
स्टील के टावर | 100 से 300 मीटर |
जी आई (आई सेक्शन) | 30 से 50 मीटर |
ओवरहेड लाइनों को जोड़ने की विधियां:-
स्लीव युक्त जोड़ –
- इसमें जोड़े जाने वाले चालक पर अंडाकार आकार की एलुमिनियम की स्लीव डाली जाती है |
- सभी एलुमिनियम चालक के लिए केवल एक प्रकार की स्लीव पर्याप्त होती है |
- ACSR के लिए सकेंद्रीय स्लीव की आवश्यकता होती है |
संपीड़न जोड़ –
जोड़ने वाले चालक को एक के बाद एक स्लीव में डालकर यह हाथ से या द्रव चालित दाब या संपीड़ित कर जोड़ा जाता है |
टेपो के द्वारा जोड़ –
इस प्रकार के जोड़ में क्लेम्प तथा नेट की भी आवश्यकता होती है |
समांतर खचो द्वारा –
इसमें समांतर चालक खाचो में स्थापित कर दिया जाता है |
नट बोल्ट संबंध –
इसमें नट बोल्ट के द्वारा ही संबंध बनाया जाता है |
सिरोंपरी लाइन के प्रकार :-
- क्षैतिज लाइन
- ऊर्ध्वाधर लाइन
सिरोपरी लाइन में लाइन रोधी का उपयोग करके करने का उद्देश्य सजीव चालक को पकड़ना तथा चालकों के खम्भों को धारा के लीकेज को रोकना है |
इंसुलेटर कितने प्रकार के होते है ?
इंसुलेटर मुख्यतः निम्न प्रकार के होते हैं-
पिन टाइप इंसुलेटर –
पिन इंसुलेटर का प्रयोग खंबो की सीधी दौड़ पर लाइन चालकों को पकड़ने के लिए किया जाता है |
यह मुख्यतः तीन प्रकार के होते है-
- एक शेड = कम वोल्टेज के लिए (230 वोल्टेज)
- डबल शेड = कम और मध्यम वोल्टेज के लिए (230 से 650 वोल्टेज तक)
- ट्रिपल शेड = 3000 से अधिक वोल्टेज पर इसका प्रयोग किया जाता है |
NOTE – सामान्यतः पिन टाइप इंसुलेटर का 11KV तक प्रयोग किए जाते है |
स्टे इंसुलेटर –
- इस लेटर को भूतल से कम से कम 3 मीटर ऊंचाई पर लगाना चाहिए |
- इसका प्रयोग सामान्यतः 33kv तक की लाइनों में किया जाता है |
- इसका उपयोग वहा भी किया जाता है जहां पर लाइन विकृत (फाल्ट) होता है |
शेकल टाइप इंसुलेटर –
- इसका उपयोग कोने के खम्भों पर तथा समापन सिरों पर किया जाता है |
- इसका प्रयोग मध्यम वोल्टेज के लिए किया जाता है |
पोस्ट विद्युत रोधी –
- इसका अन्य नाम केप या पिन टाइप इंसुलेटर भी है |
- इसका उपयोग 11kv, 22kv, 33kv पर किया जाता है ऐसे विद्युत रोधियो को बस-बार में निर्गम पात्र, फ्यूज लाइन चालक में किया जाता है |
- गैंग प्रचलित वायु ब्रेकर (G.O.A.B) आदि के आरोहण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है |
डिस्क इंसुलेटर (सस्पेंशन या लटकवा टाइप) –
- प्रत्येक डिस्क 11kv पर इसमें नई डिस्क जोड़ी जाती है |
- इसका प्रयोग 33kv के ऊपर की लाइनों में किया जाता है |
नोट-
- लोटेंशन या LT लाइनों में ऊर्ध्वाधर विन्यास अर्थ और फेज वायर के बीच 30 सेंटीमीटर का गेप होना चाहिए |
- जबकि क्षैतिज विन्यास में फेस वायर के बीच में 45 सेंटीमीटर का न्यूनतम गेप होना चाहिए |
- HT (हाई टेंशन) लाइन में त्रिभुजाकार विन्यास होता है इसमें क्रॉस आर्म भुजा के सिरों तथा विद्युत रोधी पिन छिद्र के केंद्र के बीच की न्यूनतम दूरी 10 सेंटीमीटर होना चाहिए |
- सिरोपरी लाइन में विद्युत रोधी तांबे के बंधक तार की सहायता से तभी बांधा जाता है जब चालक तांबे का हो |
- यदि चालक ACSR (एलुमिनियम कंडक्टर स्टील रेन्फोर्स) का हो तो बंधक के रूप में एलुमिनियम का बंधक काम में लिया जाता है |
- तार की साइज 2mm स्क्वायर से कम नहीं होना चाहिए |
सिरोपरी लाइन के परीक्षण?
इसके परीक्षण में मेगर का उपयोग किया जाता है मध्यम विभव के लिए 500 वोल्टेज मेगर का प्रयोग किया जाता है तथा हाई वोल्टेज के लिए 2500 या 5000 मेगर का परीक्षण किया जाता है |
ट्रांसमिशन लाइन की प्राथमिक सुरक्षा की विधियां –
- सिरोपरी लाइन पर कार्य करने से पूर्व सक्षम अधिकारी से विद्युत आपूर्ति को बंद करने की अनुमति लेना चाहिए |
- खंभों पर कार्य करते समय सुरक्षा बेल्ट का प्रयोग करें |
- संरचना की जांच करें | जैसे – खम्भे की जांच
गार्डिंग (रक्षक) –
रेल क्रोस या ट्रैक क्रॉस तथा सड़क क्रॉस एवं भीड़भाड़ वाले इलाकों में एक तार की जाली को काम में लिया जाता है जो कि गेलवेनाइज्ड आईरन की बनी होती है तथा उसे अर्थिग किया जाता है |
निम्नतम चालक का भूमि से ऊपर मुक्तन्तर (अन्तराल) जमीन से :-
- गली के आर-पार स्थापित सेवा लाइनो सहित उपरी लाइन के किसी चालक की ऊंचाई निम्न तथा मध्यम वोल्टेज में 5.486 मीटर तथा उच्च वोल्टेज में 5.791 मीटर से कम नहीं होनी चाहिए |
- 11kv तक यदि चालक तार को यदि विद्युत रोधी किया हुआ हो तो उसकी ऊंचाई 3.963 मीटर से कम नहीं होना चाहिए |
- यदि वे अनावृत (नगा तार) हो तो 4.572 मीटर से कम नहीं होना चाहिए |
- यदि मध्यम वोल्टता कि लाइन भवन के ऊपर से गुजरती है तो 2.439 मीटर छत से अंतराल होना चाहिए |
- यदि लाइन भवन के पास से गुजरती है तो अन्तराल 1.219 मीटर होना चाहिए |
- खंबे से उपभोक्ता तक ऊपरी सेवा लाइन बिछाने के लिए कांच, पोर्सलिन, लकड़ी, फाइबर क्लिटो का प्रयोग किया जाता है |
उभोक्ता को विद्युत आपूर्ति की घोषित वोल्टता क्या है?
घोषित वोल्ट से निम्न तथा मध्य वोल्टेज की स्थिति में +-5% से अधिक तथा उच्च व अति उच्च वोल्टता की स्थिति में +-12% से अधिक भिन होने की अनुमति नहीं होती है |
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